Ram navami 2022 date and time । जाने इसका महत्व और शुभ मुहूर्त ।

Ram navami 2022 । चैत्र राम नवमी 2022। 2022 ka ram navami । Ram navami shubh muhurt ।

धार्मिक ग्रंथों और श्री राम चरित मानस में लिखा हुआ है की प्रभु श्री राम जी जन्म चैत्र मास में शुक्ल पक्ष नवमी को हुआ था , जिसे हिंदू धर्म के अनुसार ram navami के दिन के रूप में मनाया जाता है ।

और जैसा की आप सभी जानते है की प्रभु श्री राम जी जन्म दोपहर के समय हुआ था जिस के कारण राम नवमी का यज्ञ और अनुष्ठान भी दोपहर के समय ही किया जाता है ।।इसे भी पढ़ें

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राम नवमी 2022 का शुभ मुहूर्त :

नवमी तिथि 10 अप्रैल 2022 है दिन रविवार

तिथि प्रारंभ 10 अप्रैल रात के 1:30 मिनिट को शुरू

तिथि समाप्त 11 अप्रैल को सुबह 3 :14 मिनिट पर समाप्त

पूजा का शुभ मुहूर्त। 10 अप्रैल को सुबह 11:10 से लेकर 1:30 मिनिट तक

राम नवमी क्यों मनाते हैं और इसका महत्व ?

शास्त्रों के अनुसार त्रेता युग में राछसों को अत्याचार बहुत चरम सीमा पर पहुंच गया था , ऋषि मुनियों को अत्यधिक ताड़नाएं दी जाती थीं, पाप इतना बढ़ गया था की अब असुरों को उचित दंड देना आवश्यक होने लगा ।।

तभी भगवान श्री हरी (विष्णु जी ) ने अपना सातवां अवतार धारण किया, जिन्हे संसार श्री राम जी के नाम से जानता है , जिस समय श्री राम जी जन्म लिया वह चैत्र मास की नवमी तिथि थी ।

धर्म की रच्छा हेतु प्रभु श्री राम जी एक साधारण पुरुष की तरह अपना जीवन व्यतीत किया , उन्होंने आने वाली पीढ़ी के लिए सद्मार्ग भी बताया ,की किस प्रकार एक पुत्र को अपने पिता के प्रति समर्पित रहना चाहिए ।

किस प्रकार एक बड़े भाई को अपने छोटे भाई के प्रति सदैव ह्रदय वत्सल रहा कर , उन्हें गलत सही का बोध कराना चाहिए। किस प्रकार नारी को उचित सम्मान देना चाहिए , किस प्रकार अपने गुरु को मान देना चाहिए ।।

किस प्रकार राज गद्दी पर बैठ कर प्रजा के प्रति निष्पच्छ फैसला सुनाना चाहिए , किस प्रकार मित्र को उच्च दर्जे का सम्मान देना चाहिए , इत्यादि ऐसी कई सारी बातें जो एक साधारण मनुष्य के जीवन में घटित होती हैं ।

सम विषम कैसी भी परिस्थिति हो मनुष्य को किस प्रकार से उनसे बाहर निकलना है , ऐसी सभी बातों की सीख श्री राम जी ने अपने जीवन काल के चल चित्रों द्वारा हमे समझने का प्रयत्न किया है।

भगवान विष्णु जी का अवतार होने के बाद भी उन्होंने कभी अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं किया ,जैसे एक साधारण मनुष्य अपने जीवन काल में अपने कष्टों से लड़ता है ,उसी तरह उन्होंने भी अपने सारे कष्टों को स्वयं से ही निर्वाह किया।।

कैसे हुआ प्रभु श्री राम जी का जन्म?

हमारे धार्मिक ग्रंथ श्रीरामचरितमानस के बालकांड में लिखी हुई चौपाई के अनुसार,राजा दशरथ जी को संतान नहीं हो रहीं थीं, तभी गुरु वशिष्ठ जी के कहने पर राजा दशरथ जी ने ,श्रृंगी ऋषि के आश्रम जाकर उनसे यह विनंती की, कि वह हमारे लिए पुत्र संतान के हेतु यज्ञ करवाएं।।

राजा दशरथ जी के इस आग्रह को श्रृंगी ऋषि स्वीकार कर लेते हैं ,और उनके लिए संतान प्राप्ति का अनुष्ठान करते हैं, यज्ञ संपन्न होने के बाद श्रृंगी ऋषि तीनों रानियों माता कौशल्या, माता कैकेई, और माता सुमित्रा को एक फल खाने के लिए देते है ।।

तब जा कर राजा दशरथ जी को 4 पुत्र रत्नों की प्राप्ति होती है ,जिसमे की
माता कौशल्या को      श्री राम
माता कैकेई को          श्री भारत
और माता सुमित्रा को।    श्री लक्ष्मण तथा श्री शत्रुधन
जी की प्राप्ति हुई सभी भाई एक से बढ़कर एक प्रतापी थे,और रघुकुल की मर्यादा को बहुत ही अनुशासन के साथ निर्वाह किया ।।

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Why Ram Navami is celebrated for 9 days?।रामनवमी 9 दिनों तक क्यों मनाई जाती है?

ऐसा पुरानी में वर्णन है की जब असुरों का अत्याचार चर्म सीमा पर पहुंच गया तब , देवताओं के आग्रह पर माता पार्वती जी ने अपने अंश से 9 अलग अलग रूप का निर्माण किया ।।

और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों से इन 9 देवियों को सुसज्जित किया , यह प्रक्रिया को पूरा होने में 9 दिन का समय लग गाया ,चैत्र के महीने में यह सब शुरू हुआ और 9 दिनों तक चला ,तभी से ये चैत्र की नवरात्रि का पावन पर्व आरंभ हो गया ।

भगवान राम कितने वर्ष जीवित रहे?

भगवान श्री राम त्रेता युग के अंत में अवतार लिए थे त्रेता के लगभग 5500 वर्ष बीत जाने के बाद श्री राम जी ने जन्म लिया था , द्वापर युग से पहले , पुराणों के अनुसार प्रभु श्री राम लगभग 11000 वर्षों तक इस धरती पर रहे ।।

भगवान राम की मृत्यु कैसे हुई ?

रावण का वध कर के जब श्री राम जब माता सीता और लछमन जी के साथ ,तब अयोध्या का कार्य भर संभालने लगे , और कुछ वर्षों के बाद एक बार उनके दरबार में काल किसी मुनि का रूप धरकर आए ।

और प्रभु श्री राम के पहरे दरों से आग्रह किया कि वे श्री से मिलने के लिए बहुत दूर से आए हैं , दरबारी जब काल की यह विनती लेकर श्री राम जी सामने गया और बताया, तो श्री राम ने दरबारी से कहा की वो उन्हें सम्मान पूर्वक हमारे पास ले आएं ।।
दरबारी कच्छ के बाहर आकर काल जो की मुनि का रूप लेकर आए थे उनसे कहा की आप अंदर जा सकते हैं, यह सुनकर काल महल में प्रवेश कर गया ।।

जब काल श्री राम जी सामने पहुंचा तब उसने राम जी से कहा की मैं आप से गुप्त वार्तालाप करना चाहता हूं कृपया हमारे और आप के अलावा यहां और कोई न रहे , जब की लछमन जी भी वहां उपस्थित थे ।।

साथ ही काल ने यह भी कहा की मुझे वचन दीजिए की अगर आप की ओर हमारी बात किसी ने सुन ली तो आप उसे मृत्यु दण्ड देंगे ।

और यह सुन कर श्री राम ने काल को वचन दे दिया की वे ऐसा ही करेंगे साथ ही श्री राम ने लछमन को बाहर जा कर खड़े रहने को बोला ये बात कह कर की कोई भी अंदर ना आने पाए तुम्हे इस बात का ध्यान रखना है ।

लछमन जी बड़े भाई की आज्ञा को पत्थर की लकीर मन कर कच्छ के बाहर आकर स्वयं पहरा देने लगे ,अचानक तभी महर्षि दुर्वासा वहा पहुंच गए ,और लछमन को देख कर उनसे कहा की वे जाकर श्री राम को यह संदेश दे दें की हम उनसे मिलना चाहते हैं ।

किंतु लछमन जी बड़े भाई की आज्ञा को शिरोधार्य समझ कर कच्छ के बाहर अडिग रहे , तभी महर्षि को क्रोध आ गया यह जानकर की उनकी आज्ञा की लछमन अवहेलना कर रहे है ।

और क्रोध में आकर महर्षि दुर्वासा जी ने लछमन को कहा की मैं उन्हें श्राप दे दूंगा ,यह बात सुन कर लछमन जी डर गए और कहा की ऋषिवर आप क्रोधित ना हों , मैं अभी जाकर आप का संदेश श्री राम को सुनाता हूं ।

यह कह कर लछमन श्री राम जी के कछ में चले गए , वहां उन्हें देख श्री राम अचंभित हो उठे , और कहा की लछमन तुमने यह क्या कर दिया , अब मुझे वचन के अनुसार तुम्हें प्राण दंड देना ही होगा । अंदर ही अंदर श्री राम इस बात को लेकर हताहत भी थे ।

श्री राम जी इस दुविधा से निकल नही पा रहे थे की कैसे वह अपने छोटे भाई को प्राण दंड दे सकते हैं , वह भाई जो उनके दुख में सदेव उनके साथ खड़ा रहा , इस गुत्थी को सुलझाने के लिए श्री राम जी ने सभी विद्वानों की सभा बुलाई।

और उनसे निवेदन किया की कृपया इस दुविधा से निकलने का कोई मार्ग प्रकाशित करें , किंतु किसी को भी यह समझ नही आ रहा था की की इसका उपाय क्या हो सकता है ।

तभी श्री राम भक्त हनुमान जी ने एक उपाय सुझाया ,और वह यह था की किसी का त्याग करना भी मृत्यु दण्ड के समान ही  होता है ,अथवा आप लछमन जी को मृत्युदंड ना देकर केवल उनका त्याग ही कर देवें ।

प्रभु श्री राम जी को यह मत उचित लगा और ऋषि मुनियों ने भी हनुमान जी की बात पर अपनी सहमति जताई , सब का मत पाकर श्री राम जी ने लछमन जी का त्याग कर दिया ,जो की मृत्यु दण्ड के समान ही था लछमन जी के लिए ।

लछमन जी श्री राम जी आज्ञा से महल त्याग कर चले गए और सरयू नदी में जाकर अपनी योग विद्या से स्वयं ही अपने जीवन का अंत कर लिया ।

इधर श्री राम जी का भी इस जन्म का कार्यकाल पूरा हो चुका था ,एक दिन उन्होंने अपने दोनो पुत्रों को अपना राजपाठ सौंप दिया और अपने मित्रों और भाई सहित सरयू नदी में जा कर समाहित हो गए ।

पुराणों के प्रमाणों के अनुसार श्री राम जी अपनी देह सहित वैकुंठ को सिधारे थे और उनके मित्र गण तथा भाई सब ने अपनी देह सरयू नदी में ही त्याग कर ही वैकुंठ सिधारे थे ।।

और इस तरह श्री राम जी ने अपना जीवन का कार्य काल समाप्त किया।
।।जय श्री राम ।।

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